Wednesday, 28 October 2015

उनकी यादों से(कफ़ील आज़र अमरोवी)
ज़िंदगी के पेड़ से 
एक पत्ता और गिर कर 
ढेर में ग़ुम हो गया है 
ढेर उन पत्तों का जो पहले गिरे थे 
हँस रहा है 
ज़िंदगी का पेड़ खुश है 
जैसे उसका बोझ हल्का हो गया है 

Wednesday, 8 July 2015

मेरे मन के नशेमन में


कुछ आस के पंछी हैं ,
इस सूने आँगन में।
इक प्यासा जीवन है,
मेरे मन के नशेमन में……

Friday, 16 January 2015

तो फिर कहाँ का मैं

तू यहीं है तो ठिकाना इक मुसलसल है ,
होगी कहीं की और तो फिर कहाँ का मैं।
(यादों के पिटारे तो मगर होंगे यही पे ,)
यादों के पिटारे तो मगर होंगें सही है ,
चुक जाएगी जो याद तो फिर कहाँ का मैं।
(हम मिलेंगे देखना तुम चाँद पूनम के ,)
मसलन देख तो लें चाँद हम भी,
दिख जाये तुमको और तो फिर कहाँ का मैं।
(नहीं नादाँ हूँ इस कदर ग़म-कोश ना कर ,)
ना करूँ ग़म-कोश फिर भी याद रखना ,
गर हुई ग़ुस्ताख़ तो फिर कहाँ का मैं।
(हुई ग़ुस्ताख़ तो मैं खुदा से मौत मांगू ,)
मेरे सिवा मत माँगना कुछ और उससे ,
आ गई गर रास उसे तो फिर कहाँ का मैं।

-प्रदीप 

Wednesday, 31 December 2014

नव-साल

मेरी तमन्ना,न मुझे नव-साल ही दे।
लौटा वही गर्दू, वो ख़याल भी दे।
ख़ार-ओ-ख़स ही नहीं बा-सब्ज़ मगर,
दे, दे, पुर्सिशे-ए-अहवाल भी दे।
@प्रदीप

नया साल


Tuesday, 2 December 2014

न राधा नाच पाती है

रह-रह के उसे सोचनें को
न वक़्त रहा, ना ही कोई याद आती है

मगर जब लिखता हूँ तो
हर दफ़ा इक फ़साद होती है

जैसे, न बचा है नौ-मन तेल
न राधा नाच पाती है 
-प्रदीप

To someone special


जाने कब भेज दे
वो इन्तिज़ार-ए-इश्क़ का खत
बस
इसी इंतजार में हूँ
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